देशबंधु की पत्रकारिता उम्दा स्तर की थी। शाब्दिक दोष अपवाद स्वरूप ही होते थे। नई दुनिया का बहुत असर था यहां। उस दौर में नई दुनिया में हम कोई शब्द गलत ढूढ़ते थे तो गदगद होते थे। अब ऐसा नहीं है। हिंदी आए न आए। जो मन में हो लिख दें। कोफ्त होती है ऐसी पत्रकारिता पर। इस संस्थान में सीखने के लिए बहुत कुछ था। खास तौर पर वरिष्ठों का सानिध्य। प्रकाश राय, राजेश पांडेय, शिवकुमार तिवारी, श्याम कटारे, राजेश उपाध्याय, निशांत शर्मा जैसे चेहरे थे। संस्कारधानी जबलपुर की पत्रकारिता में नाम था उनका। खबरों के चयन, संपादन, प्रस्तुतीकरण में हर दिन कुछ न कुछ नया सीखता था। साथी संजय सोनी, मदन गर्ग का नामोल्लेख न करूं तो यहां बिताए गए दिनों के साथ शायद न्याय नहीं करूंगा। सतना में महेश महदेले थे। तमाम नाम विस्मृत होने लगे हैं अब।
मेरे साथ यहां छायाकार के रूप में काम करने वाले आनंद मनोध्या ने एक बार मेरी बहिन बेबी (किरण) की तस्वीर दीपावली के एक दिन पहले खींची थी, दीपों के साथ। कटारे सर ने उसमें कैप्शन लगाया था। उम्दा था वह कैप्शन। यह अखबार मैं काफी समय तक रखे हुए था, लेकिन अब यह गुम गया है। पहले पेज पर चार कालम में तस्वीर लगी थी। इसी अखबार में सुगन जाट भी थे छायाकार के रूप में। ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने में उनकी तस्वीरें ऐसी होती थीं कि अंग्रेजी अखबारों के फोटोग्राफर भी कई बार पानी पीते नजर आते थे। मुझे याद है उनकी एक तस्वीर। हुआ यह था कि मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में अर्जुनसिंह जबलपुर आए थे। डमुना विमानतल पर उतर रहे थे। नीचे काफी भीड़ थी। एक कांग्रेसी उन्हें गुलदस्ता थमा रहा था और अर्जुनसिंह विमान के बाहर निकल रहे थे। तस्वीर में विमान, अर्जुनसिंह का चेहरा, गुलदस्ता और लोगों के सिर ही दिखाई दे रहे थे। इसी अखबार में मुझे पहले पेज पर एंकर के रूप में पहली बार छपने का मौका मिला। साथ ही संपादकीय पेज पर भी। संपादकीय पेज पर पहली बार कौन सा लेख छपा था, यह तो याद नहीं। अलबत्ता उस वक्त जितनी खुशी हुई थी, उतनी कभी नहीं हुई। खुद को बौद्धिक मानने का भ्रम और फैला लिया। यह जस का तस है। भारत में पहली बार हुई मिस युनिवर्स प्रतियोगिता पर विशेषांक भी निकाला था यहीं पर। दूसरे अखबार खासकर नवभारत, भास्कर को ही प्रतिद्वंद्वी मानता था उस दौर में। पहले पेज के ले आउट, खबरों के चयन को लेकर जूझता था। होड़ होती थी। क्या मैंने किया है क्या दूसरे ने। जिस दिन लेटनाइट की कोई खबर छूट जाती थी, दुख होता था और जिस दिन बढ़त लिए होते थे, अजीबोगरीब खुशी होती थी। यह दौर वर्ष 1995 तक निर्वाध गति से चला। देशबंधु में ही काम करते-करते कोटा मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल कर ली। पनचानबे में ही अरविंद बिंजोलकर, विनय गुप्ता इत्यादि आ गए। अरविंद ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में ही स्नातकोत्तर कर लेने की सलाह दी। उनके साथ एग्जाम भी दे आए और सिलेक्ट हो गए। इसी साल मां गोलोकवासी हो गईं। जब एडमिशन लेना था तो गांव में उनकी तेरहवीं थी। खैर एडमिशन हो गया। देशबंधु में जिस पद पर था, उसी हैसियत से भोपाल तबादला हो गया। भोपाल में राजेश पांडेय पहले ही पहुंच थे, लेकिन वहां मन नहीं लगा। एक साल का कोर्स खत्म कर वापस जबलपुर आया तो पिता जी रिटायर हो चुके थे। देशबंधु में फिर काम करने की सोची, लेकिन वेतन को लेकर बात नहीं जमी। दरअसल जिम्मेदारियां बढ़ चुकी थीं। एक बेटे का बाप भी हो चुका था। सरकारी क्वाटर छूट गया था। किराए के मकान में रहने का मतलब था ज्यादा बोझ। देशबंधु की कमान इस दौर में गिरिराज चाचा के हाथ में थी। मैं साढ़े तीन हजार रुपये चाहता था, वह तीन हजार से अधिक देने के लिए तैयार नहीं थे। बस, मैंने तय कर लिया कि अब भोपाल चलना चाहिए। तत्कालीन दौर में वहां सर्वाधिक बिकने वाले अखबार नवभारत में महराज जी थे असल नियोक्ता। उन्होंने लिखित परीक्षा ली और इंटरव्यू लिया। पास हो गए। वेतन लगा 38 सौ रुपये। मुझे यह काफी समझ में आए। हां नौकरी कन्फर्म नहीं थी। अस्थायी थी। स्थायी किए जाने का भरोसा मिला था। दिसंबर 96 में जबलपुर छूट गया।
नवभारत में पहुंचने से पहले एक और प्रसंग। बहिन की शादी 96 की गर्मियों में हुईं। पिताजी के रिटायरमेंट से एक महीने पहले। इसी समय राजस्थान पत्रिका से आफर आया था। कैलाश मिश्र संपादक थे वहां। मैंने गुलाब कोठारी को आवेदन भेजा था। वैवाहिक व्यस्तताओं की वजह से जा नहीं सका। यह मौका छूटने का अफसोस है। कहते हैं कि तकदीर रोज दरवाजा नहीं खटखटातीं। जब मौका मिले तो कैश कर लेना चाहिए।
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