सप्ताह गुजर गया। बाबू जी की हालत में थोड़ा सुधार दिखा है, लेकिन अब भी उनका चलना फिरना बंद है। छोटे भाई दीपू ने बताया है कि पैर तो हिल रहा है, लेकिन वह साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी कमजोरी मानसिक ज्यादा है। जब पैर में मूवमेंट है तो उन्हें चलना चाहिए, लेकिन पता नहीं क्यों, वह जोखिम नहीं ले रहे हैं। संभवतः वह हम सबकी परीक्षा ले रहे हैं। उनके पिता जी ने भी ऐसी ही परीक्षा ली थी।
हमारे खान दान का यह पुश्तैनी चलन है क्या? इसका उत्तर समय पर छोड़ देता हूं। हां अपने और अपनी आने वाली संततियों के लिए ईश्वर से यह कामना जरूर करता हूं कि वह हमें इस हालत में कभी नहीं लाए।
बीमारी। बड़ी खराब चीज है यह। जो बीमार हो वह तो होता ही है, दूसरे भी परेशान हो जाते हैं। खासकर मेरे जैसे इमोशनल व्यक्ति के लिए तकलीफ बढ़ जाती है। दफ्तर में हूं अथवा घर में। अज्ञात भय सताता है। पता नहीं क्या होगा? इस बार हम सब गर्मियों में गांव में कुछ निर्माण कराने की तैयारी में थे, लेकिन विधि का विधान पता नहीं था। आखिर किसे पता होता है विधि का विधान।
चिकित्सक कह रहे हैं कि आपरेशन अंतिम विकल्प है। यह जोखिम भरा है। बाबू जी को जाने क्यों यह बात समझ नहीं आ रही है। यदि आपरेशन के बाद भी बात नहीं बनी तब? यह सवाल कठिन है। इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। अब तो यही मान कर चल रहा हूं कि जो भी होगा, उसे सिर माथे लेना पड़ेगा। और कोई कर भी क्या सकता है। वैसे पिता जी यदि चलने फिरने लगते हैं, कम से कम इस लायक हो जाते हैं कि लैट्रिन बाथरूम खुद से जा सकें तो उन्हें अपने पास ही रखूंगा। भले ही दिन भर गरियाएं। जब तक जियें गरिया लें। यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। और तो कुछ दे नहीं सके हैं वह। श्राप -गाली जो कुछ उनके पास है, वही दे दें। जिंदगी किराए के घर में कट गई। प्राइवेट नौकरी में इतना पैसा नहीं जुटा पाया कि अपने लिए दो कमरे का फ्लैट ही कहीं बना लेता। जब मौका था तब चेता नहीं जब चेता तो पैसा नहीं। बेटे शुभम आयुष किसी लाइन से लग जाएं तो चिंता दूर हो जाए। बस यही चाहता हूं अब। मैं तो इतना ही जानता हूं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसलिए अपने मन को सबल बन रहा हूं।
हमारे खान दान का यह पुश्तैनी चलन है क्या? इसका उत्तर समय पर छोड़ देता हूं। हां अपने और अपनी आने वाली संततियों के लिए ईश्वर से यह कामना जरूर करता हूं कि वह हमें इस हालत में कभी नहीं लाए।
बीमारी। बड़ी खराब चीज है यह। जो बीमार हो वह तो होता ही है, दूसरे भी परेशान हो जाते हैं। खासकर मेरे जैसे इमोशनल व्यक्ति के लिए तकलीफ बढ़ जाती है। दफ्तर में हूं अथवा घर में। अज्ञात भय सताता है। पता नहीं क्या होगा? इस बार हम सब गर्मियों में गांव में कुछ निर्माण कराने की तैयारी में थे, लेकिन विधि का विधान पता नहीं था। आखिर किसे पता होता है विधि का विधान।
चिकित्सक कह रहे हैं कि आपरेशन अंतिम विकल्प है। यह जोखिम भरा है। बाबू जी को जाने क्यों यह बात समझ नहीं आ रही है। यदि आपरेशन के बाद भी बात नहीं बनी तब? यह सवाल कठिन है। इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। अब तो यही मान कर चल रहा हूं कि जो भी होगा, उसे सिर माथे लेना पड़ेगा। और कोई कर भी क्या सकता है। वैसे पिता जी यदि चलने फिरने लगते हैं, कम से कम इस लायक हो जाते हैं कि लैट्रिन बाथरूम खुद से जा सकें तो उन्हें अपने पास ही रखूंगा। भले ही दिन भर गरियाएं। जब तक जियें गरिया लें। यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। और तो कुछ दे नहीं सके हैं वह। श्राप -गाली जो कुछ उनके पास है, वही दे दें। जिंदगी किराए के घर में कट गई। प्राइवेट नौकरी में इतना पैसा नहीं जुटा पाया कि अपने लिए दो कमरे का फ्लैट ही कहीं बना लेता। जब मौका था तब चेता नहीं जब चेता तो पैसा नहीं। बेटे शुभम आयुष किसी लाइन से लग जाएं तो चिंता दूर हो जाए। बस यही चाहता हूं अब। मैं तो इतना ही जानता हूं कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। इसलिए अपने मन को सबल बन रहा हूं।
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