सामाजिक आर्थिक व जातिगत जनगणना मेरे सामने है। इसमें एक तथ्य यह है कि गांवों में आज भी पांच हजार से कम में गुजारा हो रहा है। करीब 75 फीसद परिवार ऐसे ही बताए जा रहे हैं। शहरों में औसत आय कितनी है, यह आंकड़ा मुझे नहीं मिल सका है। मेरा अपना अनुमान है कि करीब 10 हजार रुपये होगी यह। इलाहाबाद में जहां मैं रह रहा हूं इन दिनों, वहां एक कमरा का न्यूनतम मकान किराया ही दो हजार रुपये है। कैसे गुजर बसर करते होंगे लोग इतनी रकम में, इसे समझ पाने में मैं नाकाम हूं। मैं अपनी बात करूं। मेरी तनख्वाह कट पिट कर करीब 28 हजार रुपये बैठती है। इसमें आठ हजार रुपये दो कमरों वाले उस अदद मकान के नाम पर निकाल देता हूं, जो कायदे से रहने लायक नहीं है। उसके बाद की गुजर बसर कैसे होती है, यह ऊपर वाले पर छोड़ देता हूं। यदि अभी भी पिता जी से समय -समय पर सहयोग नहीं मिले तो अनुमान ही लगा सकते हैं आप। बच्चों की फीस-दीगर खर्च के बाद कुछ नहीं बचता। कहने के लिए करीब दो दशक से पत्रकारिता में झक मार रहा हूं, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि परिवार के साथ किसी थ्री स्टार में जाकर डिनर या लंच ले संकू। ढाबे में गए हुए भी सात साल की अवधि बीत चुकी है परिवार के साथ डिनर के नाम पर। सीबीएसई स्कूल में पढ़ते हैं छोटे चिरंजीव आयुष। जुलाई में ही बीस हजार रुपये की फीस बता रहे हैं। किताब कापी, यूनीफार्म जूते इत्यादि का खर्च अलग है। इसी महीने बड़े चिरंजीव शुभम लखनऊ जाएंगे अपने पांचवें सेमेस्टर के लिए। फीस का जुगाड़ तो लोन से हो जा रहा है उनका लेकिन और भी खर्चे होते हैं। खाने और रहने के लिए छत के नाम के। हर महीने पांच से छह हजार रुपये उन पर ही चले जा रहे हैं। कैंपस इंटरव्यू के लिए सूट की फरमाइश आ गई है उनकी तरफ से। राम जाने इसका इंतजाम कैसे हो पाएगा।
टेंट ढीली हो तो तनाव रहता है। तनाव होता है तो आप अपने दायित्वों को कायदे से नहीं निभा पाते। लेकिन सफल से सफलतम बने लोग यही नसीहत देते हैं कि हिम्मत न हारिए बिसारिए न हरि नाम। जेंहि विधि राखै राम, तैंहि विधि रहिए। सही हैं ऐसे नसीहत बाज। मैं भी यही सीख देता है दिल को बहलाने के लिए लेकिन जब कभी द्ररिदता को नुमाया करने वाली ऐसी रिपोर्ट्स से दो चार होता हूं तो तंतु झनझना जाते हैं शरीर के। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अगला जनम कम से कम देव भूमि यानि भारत में नहीं देना। पाखंडियों, दोगलों से भरे इस देश में इंसान की कोई कीमत नहीं है। यहां प्रवचन बाज ही काफी हैं उल्लू बन कर हर साख पर बैठे हैं। गाल बजाने वाले यह लोग तरक्की करें, लेक्चर दें, सफल रहें।
टेंट ढीली हो तो तनाव रहता है। तनाव होता है तो आप अपने दायित्वों को कायदे से नहीं निभा पाते। लेकिन सफल से सफलतम बने लोग यही नसीहत देते हैं कि हिम्मत न हारिए बिसारिए न हरि नाम। जेंहि विधि राखै राम, तैंहि विधि रहिए। सही हैं ऐसे नसीहत बाज। मैं भी यही सीख देता है दिल को बहलाने के लिए लेकिन जब कभी द्ररिदता को नुमाया करने वाली ऐसी रिपोर्ट्स से दो चार होता हूं तो तंतु झनझना जाते हैं शरीर के। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि अगला जनम कम से कम देव भूमि यानि भारत में नहीं देना। पाखंडियों, दोगलों से भरे इस देश में इंसान की कोई कीमत नहीं है। यहां प्रवचन बाज ही काफी हैं उल्लू बन कर हर साख पर बैठे हैं। गाल बजाने वाले यह लोग तरक्की करें, लेक्चर दें, सफल रहें।
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