इतवार को दिन में दफ्तर नहीं आ सका। इसलिए चाहकर भी कुछ नहीं लिख पाया। अभी थोड़ा वक्त मिला है तो सोच रहा हूं कि मन की कुछ लिख दूं। आज अकेला हूं घर पर। शुभम मां के साथ ननिहाल चले गए हैं। मुझे भी कह रहे थे चलने के लिए लेकिन नौकरी है वह भी प्राइवेट। छुट्टी कहां मिलती है अपन को। होली के बाद से गांव भी नहीं जा सका हूं। अब दरख्वास्त लगाऊंगा लंबी छुट्टी की। कम से कम चार दिन की। दरअसल घुटन सी होने लगी है एक सा काम करते-करते। कभी कभी ही ऐसा दिन होता है जब अच्छा लगता है। गुजरा शनिवार ऐसा ही था। प्रतापगढ़ के रेहुआ लालगंज के दो बच्चों के इस दिन जेईई-एडवांस में कामयाबी की खबर मिली। टेलीविजन पर देखा। मन प्रफुल्लित हुआ। लगा कभी-कभी गरीबी भी बेहतरी की तरफ ले जाती है, बस माद्दा हो। दोनों ही सगे भाई हैं और उनकी कामयाबी ने दुनिया उनके अनुकूल कर दी है। ऐसा ही होता है। जब हम कामयाब होते हैं तो सब अपने हो जाते हैं। पराए भी। शायद श्रीकृष्ण ने इसीलिए गीता में अर्जुन से कहा है कि हे पार्थ -इतिहास विजेताओं के साथ होता है। पराजितों के साथ नहीं। बृजेश और राजू सरोज अब विजेता हैं। गरीबी से लड़कर कामयाबी की जंग जीतने वाले। ईश्वर मेरे बेटों में भी उनसे प्रेरणा लेने की जिजीविषा पैदा करें, यही कामना है।
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