दिन रविवार।
आज दिन में नहीं आ सका था दफ्तर। मकान तलाशने का दौर जो था। निराशा लगी है इस मोर्चे पर। अब देखिए सोमवार कैसा रहता है, इस मामले में। तनाव जस का तस है। पूरा परिवार तनाव के लम्हों से गुजर रहा है। मित्रों का प्रयास भी जारी है इस दिशा में लेकिन अपन की बदकिस्मती ज्यादा जोर मारे हुए है। ऐसा नहीं है कि मकान हैं नहीं। हैं, लेकिन आठ से 10 हजार रुपये मासिक किराए वाले। इतना दे पाना अपने बूते में नहीं है। इसलिए बस ऊपर वाले को याद कर रहा हूं। आखिरी उम्मीद वही हैं। कुछ न कुछ रास्ता निकालेंगे। ऐसा विश्वास है। घर खोजने का तनाव दैनदिनी पर असर डाल रहा है। न कुछ लिखने का मन करता है, न पढ़ने का। रविवार के दिन अखबारों के विशेष आलेखों को भी इसी वजह से कायदा से नहीं पढ़ सका।
दिन में लेटा था कुछ देर के लिए।
याद आ गया जबलपुर में पीडब्लयूडी कालोनी में पिता जी के नाम आवंटित हुआ आवास। तीन कमरे, आंगन, बरामद, पीछा बगीचा। पता नहीं क्या-क्या। पच्चीस बसंत गुजर गए इसमें पता ही नहीं चला। अब लगता है कि पिता जी को वह मकान नहीं मिला होता तो वह भी किरायेदारों का दर्द महसूस किए होते। यदि महसूस किए होते तो कहीं न कहीं जरूर मकान बनवा लिया होता। मकान बना होता तो खानाबदोश न होते अपन। यह खानाबदोशी भारी पड़ रही है उम्र के पैंतालीसवें पड़ाव पर। पत्नी हो या बच्चे। हर कोई कहते कुछ नहीं हैं, लेकिन झल्लाते हैं अपनी बदकिस्मती पर। मीरजापुर के शुभचिंतक पंडित संतोष शास्त्री कल रात व्हाट्स एप पर थे। मैंने अपनी समस्या बताई। उन्होंने समाधान। कहा जल्दी हो जाएगा नया ठिकाना। पर अपनी खुद की छत कब होगी? यह सवाल मथता है हर पल मुझे। उत्तर तलाशता हूं, मिल नहीं पाता। अंत में इस निचोड़ को दिल में बैठा लेता हूं कि चलो खानाबदोश...। बंद करो चिंतन। बंद करो मर्सिया।
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