नमस्कार। आज दिन मंगलवार। सुबह रसूलाबाद घाट पर दूसरी तरफ जाकर सपत्नीक गंगा स्नान किया। ज्येष्ठ पूर्णिमा थी। श्रद्धा का आग्रह था। टाला नहीं जा सकता था। मन गदगद हो गया। शीतल जल में। वैसे घाट से नाव पर चढ़ते समय नाले का गंगा में प्रवाह मन कसैला करने वाला था, लेकिन इस पर कोई वश नहीं था। नाविक ने कहा- मां हैं बेटे इसी तरह पाप कर रहे हैं...। नमामि गंगे। बस यही कहते हुए मन ही मन में रह गया। साढ़े नौ बज गए नहा कर मुख्य सड़क तक पहुंचने में। आटो पकड़ी और उतर गए स्टेनली रोड पर बेली अस्पताल के ठीक सामने। शर्मा जी के मकान को भी देखना था। सोमवार रात ही तय कर आया था कि सुबह आऊंगा घर देखने। सेकेंड फ्लोर पर है उनका घर का वह हिस्सा जिसे वह किराए पर देना चाहते हैं। सिंचाई विभाग के अधीक्षण अभियंता रह चुके हैं शर्मा जी। अब वकालत करते हैं हाईकोर्ट में। मकान हमें (मुझे और श्रद्धा को) पसंद है, लेकिन किराया पांव में बेड़ी है। आठ हजार रुपये की डिमांड है, इसकी। अभी दुबे जी के मकान में साढ़े पांच हजार रुपये में ही काम चल जा रहा था। लेकिन मकान बदलना ही है तो मन दृढ़ कर रहा हूं। अगली तकलीफों के लिए। यदि शुभम के साथी और हमारे पुत्रवत रजनीश तैयार होते हैं तो शायद मामला बन जाएगा। नहीं तो...।
बहरहाल, आज सुबह कुछ खबरें देखीं। एक मेरे ही अखबार यानी जागरण में थी। इसमें जानकारी यह है कि कम कमाई वालों के लिए ज्यादा आशियाने बनेंगे। उप्र की अखिलेश सरकार ने विकास प्राधिकरणों-आवास विकास परिषद को तिरासी हजार आवास-भूखंड तैयार करने का निर्देश दिया है, इसमें इलाहाबाद में कितने बनेंगे, पता नहीं। पिछले दिनों ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के मकानों खास कर एलआइजी-जूनियर एमआइजी के बारे में पता करवाया था। पिछले पांच साल में कोई भी बड़ी योजना नहीं आई। ऐसे में 83 हजार मकान शायद ख्वाब ही रहें, इस वित्तीय वर्ष में। जाने कब से सुनता आ रहा हूं, सबको छत मयस्सर कराने की सरकारी कवायदों के बारे में। कुछ समय पहले चीन के बारे में यह रोचक तथ्य सामने आया था कि वहां शहरी आबादी के लिए सौ फीसद छत का प्रबंध है और ग्रामीण आबादी के लिए अस्सी फीसद। भारत में साठ साल में भी ऐसा नहीं हो सका है। एक तरफ बड़े बड़े बंगले हैं भ्रष्टाचार की कमाई से बने हुए। दूसरी तरफ हम जैसे लोग हैं जो पांच सौ फुट की अदद छत के लिए तरस रहे हैं। दावा है कि हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है। तीस हजार रुपये की तनख्वाह में दो बच्चों की पढ़ाई, किराना, दूध तथा अन्य मद में खर्च के बाद बचेगा ही क्या ? यदि मेरे जैसे लोग आठ हजार रुपये मकान के किराए में दे देंगे? लेकिन सरकारों को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी।
सरकार यदि सबको छत देना चाहती है तो मेरे पास एक सुझाव है। आवास विकास विभाग अथवा प्राधिकरणों में बेघरों का पंजीयन करा लिया जाए। संख्या पता चल जाएगी। फिर उन्हें मकान दिलाए जाएं। किराए से ही सही। मेरे जैसे लोग जो प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत हैं उनकी पीएफ जमा सिक्योरिटी के रूप में ली जा सकती है। और फिर एक किश्त बांध दी जाए किराये के रूप में। जब लागत निकल जाय तो मकान का स्वामित्व दे दिया जाए। क्या इस पर विचार हो सकता है। यदि हां. तो उपयुक्त होगा। खैर फिलहाल चिंता यह है कि अगली छत कैसी मयस्सर होगी। उम्मीद ऊपर वाले पर टिकी है। कहता भी रहा हूं कि जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा भी देगा। आशा और निराशा का यह खेल भी गजब है...पर किया क्या जाए। जिंदगी इसी का नाम है।
बहरहाल, आज सुबह कुछ खबरें देखीं। एक मेरे ही अखबार यानी जागरण में थी। इसमें जानकारी यह है कि कम कमाई वालों के लिए ज्यादा आशियाने बनेंगे। उप्र की अखिलेश सरकार ने विकास प्राधिकरणों-आवास विकास परिषद को तिरासी हजार आवास-भूखंड तैयार करने का निर्देश दिया है, इसमें इलाहाबाद में कितने बनेंगे, पता नहीं। पिछले दिनों ही इलाहाबाद विकास प्राधिकरण के मकानों खास कर एलआइजी-जूनियर एमआइजी के बारे में पता करवाया था। पिछले पांच साल में कोई भी बड़ी योजना नहीं आई। ऐसे में 83 हजार मकान शायद ख्वाब ही रहें, इस वित्तीय वर्ष में। जाने कब से सुनता आ रहा हूं, सबको छत मयस्सर कराने की सरकारी कवायदों के बारे में। कुछ समय पहले चीन के बारे में यह रोचक तथ्य सामने आया था कि वहां शहरी आबादी के लिए सौ फीसद छत का प्रबंध है और ग्रामीण आबादी के लिए अस्सी फीसद। भारत में साठ साल में भी ऐसा नहीं हो सका है। एक तरफ बड़े बड़े बंगले हैं भ्रष्टाचार की कमाई से बने हुए। दूसरी तरफ हम जैसे लोग हैं जो पांच सौ फुट की अदद छत के लिए तरस रहे हैं। दावा है कि हमारी अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति से बढ़ रही है। तीस हजार रुपये की तनख्वाह में दो बच्चों की पढ़ाई, किराना, दूध तथा अन्य मद में खर्च के बाद बचेगा ही क्या ? यदि मेरे जैसे लोग आठ हजार रुपये मकान के किराए में दे देंगे? लेकिन सरकारों को यह बात कभी समझ में नहीं आएगी।
सरकार यदि सबको छत देना चाहती है तो मेरे पास एक सुझाव है। आवास विकास विभाग अथवा प्राधिकरणों में बेघरों का पंजीयन करा लिया जाए। संख्या पता चल जाएगी। फिर उन्हें मकान दिलाए जाएं। किराए से ही सही। मेरे जैसे लोग जो प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत हैं उनकी पीएफ जमा सिक्योरिटी के रूप में ली जा सकती है। और फिर एक किश्त बांध दी जाए किराये के रूप में। जब लागत निकल जाय तो मकान का स्वामित्व दे दिया जाए। क्या इस पर विचार हो सकता है। यदि हां. तो उपयुक्त होगा। खैर फिलहाल चिंता यह है कि अगली छत कैसी मयस्सर होगी। उम्मीद ऊपर वाले पर टिकी है। कहता भी रहा हूं कि जिसने चोंच दी है, वही चुग्गा भी देगा। आशा और निराशा का यह खेल भी गजब है...पर किया क्या जाए। जिंदगी इसी का नाम है।
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