रविवार, 31 मई 2015

उपदेश, अपमान और सम्मान

कल पत्रकारिता दिवस था। मुझे न्योता मिला था सम्मान करवाने के लिए। झूंसी जाना था। भारतीय संस्कृति एवं साहित्य संस्थान के तत्वावधान में यह आयोजन हुआ। डा. विजयानंद का विशेष आग्रह था कि मैं उपस्थित होऊं। लेकिन साथी अवधेश पांडेय की मां की निधन की खबर मिली मैं अन्य सहयोगियों के साथ अस्पताल पहुंच गया। वहां से दफ्तर। फिर चार बज गए। खबरें भेजने और गढ़ने के फेर में। विजयानंद ने जी सूचना दी है कि मेरा प्रमाणपत्र व शाल रख लिया गया है। कोई सम्मान करना चाहे और अाप अभिमान में तने रहें, मैं उनमें नहीं हूं। ठीक है कि अपमान का आदी हूं। कदम दर कदम अपमान ही जीवन में ज्यादा रहा है। लेकिन यही मेरा प्रारब्ध है। सम्मान ही देना होता तो ईश्वर टाटा-बिड़ला -अंबानी के घर पैदा करते। प्रतापगढ़ के दिलीपुर के पूरे रूपधर पांडेय के पुरवा के कच्चे घर में तो कतई नहीं। माना कि तमाम ऐसे गुदड़ी के लाल हैं जो मुझसे भी गई गुजरी परिस्थितियों में धरा पर अवतरित हुए और उन्होंने आसमान अपने नाम कर लिया है, लेकिन भई मैं यह नहीं कर सका, इसे स्वीकार करता हूं बिना किसी लाग लपेट के।
खैर, मई महीने का यह आखिरी दिन है। कल से कई चीजें महंगी हो जाएंगी। सर्विस टैक्स बढ़ रहा है। तो महंगाई का मीठा डंक मेरे साथ-साथ आपको भी मुबारक। नहीं बढ़ेगी तो सिर्फ तनख्वाह। और हम चिल्लाते रहेंगे कि अच्छे दिन आ गए हैं। अच्छे दिन आ गए हैं। आज रविवार है। हर इतवार  को मैं बड़े स्तंभकारों  (पत्रकारों) के विचार पढ़ता हूं। इस संडे हिंदुस्तान में शशिशेखर जी ने मुफलिसी के मारों की दास्तां लिख मारी है। मदर टेरेसा के इन शब्दों के साथ कि हम कई बार सोचते हैं कि सिर्फ भूखा, नंगा और बेघर होना गरीबी है, लेकिन नहीं। इस दुनिया में सबसे बड़ी गरीबी अवांछित, अप्रिय व उपेक्षित होना है। ठंड और गर्मी से मरने वालों के आंकड़े के साथ शशि शेखर जी ने बखूबी मर्म को समझाने की कोशिश की है। मेरे अपने अखबार जागरण में हमारे प्रधान संपादक संजय गुप्त ने एक साल की मोदी सरकार की आलोचना में कांग्रेस की अपरिपक्वता देखी है। कभी कभी मुझे भी ऐसा लगता है कि क्यों नहीं कांग्रेस को मौजूदा दुर्व्यवस्था के लिए जिम्मेदार मानना चाहिए। खैर, इसी रविवार को अमर उजाला में पूर्व केंद्रीय मंत्री और फिलहाल स्तंभकार बन चले पी. चिदंबरम ने एक छदम नागरिक के रूप में प्रधानमंत्री के नाम खुली पाती लिखी है। अच्छे दिनों को खारिज करते हुए। उनका कहना है कि चुनौतियां तो हर सरकार को मिलती हैं विरासत में। नई सरकार का कर्तव्य भी वह बताते हैं। अब उनसे यह सवाल कौन करे कि दस साल आपकी सरकार थी तो आपने कौन सा तीर मार दिया था। अटल जी की सरकार यदि कबाड़ा कर गई थी तो उसे आप दस साल में क्यों ठीक नहीं कर सके। और यदि नहीं कर सके तो एक साल की सरकार से सवालों का हक किसने दिया है आपको। लोकतंत्र है इसलिए आप कहिए-लिखिए पढ़िए पर सवालों के लिए भी तैयार रहिए। मोदी सरकार काम नहीं करती तो जनता ने जैसे उन्हें सत्ता दी है, वैसे ही छीन भी लेगी लेकिन जो काम वह करना चाहती है उसे वह करने तो दीजिए। भूमि अधिग्रहण बिल, जीएसटी पर रोड़ा क्यों? आपकी सरकार थी तो भाजपा ने साथ दिया था भूमि विधेयक पारित कराने में। अब यदि उन्हें (मोदी सरकार को) लग रहा है कि इसमें कुछ कमियां थीं तो क्या उन्हें इसे दुरुस्त करने का हक नहीं होना चाहिए। चिदंबरम जी को काम कम और बातें ज्यादा होती दिख रही हैं, मैं उनसे कुछ हद तक सहमत हूं। मेरे जैसे खानाबदोशों के लिए सरकार छत की दिशा में कुछ सार्थक करती नहीं दिख रही है। मैं इलाहाबाद में अदद किराए के मकां की तलाश में हूं। हां, तीन सौ तीस रुपये में दो लाख रुपये के बीमा वाला फार्म भर दिया है। यानी घर वालों के लिए दो लाख रुपये पक्के कर जा रहा हूं, मोदी सरकार की किरपा से। पत्नी का फार्म भरवाना बाकी है, अब जिस भी दिन छुट्टी मिलेगी, वह भी करवा दूंगा। लोअर मिडिल क्लास के लिए दो लाख रुपये काफी होते हैं चिदंबरम जी। साठ साल पहले आपकी कांग्रेस ने ऐसी ही कोई पहल क्यों नहीं की थी, यह सवाल अब आपसे है...राहुल जी से है...। प्लीज इसका जवाब दिलवा दीजिएगा। बड़ी मेहरबानी होगी।

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