गुरुवार, 7 मई 2015

देखते हैं कब राम की होगी माया

रात में दफ्तर से घर पहुंचने के बाद कई बातें मन में उमड़ती -घुमड़ती हैं। ब्लाग पर क्या लिखूं, क्या नहीं, इसी उधेड़बुन में कभी दो तो कभी तीन बज जाता है। खबर की दुनिया में हूं, लेकिन लगता है कि खबरची चंद मौकों पर ही खबर बनते हैं। बनते रहेंगे। पेश के शुरुआती दिनों में ऐसा नहीं लगता था। राह कठिन होगी, यह तो जानता था, लेकिन इतनी दुरुह, यह नहीं। नब्बे के दशक में अनायास इस पेशे में आना हुआ। एक्सीडेंटल कह सकते हैं इसे। जबलपुर में मेरे शुभेच्छु अचरज करते थे, मेरे फैसले पर। कुछ ही ऐसे थे, जिन्होंने पीठ थपथपाई होगी। खैर। देश बंधु में मायाराम सुरजन जी का साप्ताहिक स्तंभ पढ़ता था, धूप छांव के दिन। इसमें आदरणीय मायाराम जी मन की बात लिखा करते थे। उनकी आपबीती जीवन पथ पर संघर्ष की प्रेरणा देती थी। कल्पना के संसार में उड़ता था। सोचता था अपन का भी एक प्रिटिंग प्रेस होगा। साथ में काम करने वाले तमाम लोग होंगे। हम मिलकर नया संसार रचेंगे। ऐसा संसार, जिसमें दुख-दर्द के लिए जगह नहीं हो। यह सपना वक्त के साथ हवा में उड़ता गया। अब जिस मुकाम पर हूं। वहां सिर्फ दो ही बातें सोचता हूं। शुभम-आयुष जिंदगी में कुछ मुकाम पा जाएं और एक अदद ऐसी छत हो इलाहाबाद में जिसे खुद की कह सकूं। 
कहते हैं इंसान अपनी भूलों से सीखता है। मैंने भी कुछ सबक सीखे हैं। इसमें सबसे पहला यह कि जब मौका मिले तो दुनियावी जरूरतों को पहले पूरा कर लिया जाए। मसलन, घर-वाहन इत्यादि। फिर आर्थिक रूप से समृद्धि। इसके लिए जीवन के ४० साल अहम होते हैं। यदि इसमें आप यह नहीं कर सके तो राह आसान नहीं रह जाती। ऐसा नहीं है कि मैं इस दिशा में उदासीन रहा हूं, लेकिन तकदीर से ज्यादा तो पा नहीं सकता। सो नहीं पा सका। अपनी छत आज भी मयस्सर नहीं है। किराए के मकां में जिंदगी अधेड़ावस्था की तरफ बढ़ चली है। ईश्वर से यही कामना है कि बुढ़ापा अपनी खुद की छत के नीचे कट जाए। पिछले एक दशक से यही सपना लिए हुए जी रहा हूं। खबरचियों के लिए सरकार की छत की कोई स्कीम हो तो शायद यह हो भी जाए। पर जगह है कहां। यदि कहीं है भी तो इतनी महंगी कि अपन सोच तक नहीं सकते। दो दिन पहले हिंदुस्तान में एक खबर पढ़ी थी। इसमें लिखा था कि आवास विकास के एलआइजी की मासिक किश्त ही अड़तीस हजार रुपये है। अपनी इतनी सेलरी अभी तक नहीं है। हां, मेरे तमाम शुभेच्छुओं की इससे कहीं ज्यादा है। वह आबाद भी हैं अपनी-अपनी जगह। मुझे उनकी तरक्की से खुशी होती है और अपनी हालत पर तरस आता है, पर करिएगा क्या यही तो राम की माया है।  जब उनकी माया होगी तब अपना भी मकां होगा। पुण्य सलिला गंगा -यमुना के बीच कहीं। नर्मदा मैया का शहर तो जाने कब से बेगाना हो गया अपन के लिए। 

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