अभी कुछ देर पहले ही लौटा हूं। दारागंज घाट से। सहयोगी आशुतोष तिवारी की मां नहीं रहीं। शनिवार रात वह श्रीहरि के धाम में पहुंच गई थीं। आशुतोष जी ने रविवार को मुखाग्नि दी। पंचभूतों से रचित देह कुछ ही देर में मिट्टी हो गई। विधाता की लीला ही है यह। आवागमन के संसार में सारे नाते-मोह श्मशान घाट पर खत्म दिखते हैं। हर बार ऐसा ही होता है। घाट से लौटता हूं तो सोचता हूं, किसी न किसी जन्म में कोई रिश्ता जरूर रहा होगा, उस आत्मा से, जिसके लिए यह क्षण जा रहा है। दुनियावी औपचारिकताएं होती हैं, हम सभी निभाते हैं। घाट पर अंतिम कर्म में शरीक होने का कर्म तो निश्चल भाव से होता है। आखिर हर किसी को एक दिन यही गति जो मिलनी है। खैर। यही माया है। ऐसा ही आगे भी होगा। होता रहेगा। इसमें कुछ भी नया नहीं। नया इतना ही होता है कि जिदंगी क्षणभंगुर लगती है। कुछ ही देर के लिए सही। कुछ समय-घंटे क्षण भर पहले हाड़-मांस का जो शरीर मां-पिता, भाई, बहन, पुत्र, पुत्री के रूप में रहता है वह मिट्टी कहलाता है। इस मिट्टी का मोल हमें पहचानना चाहिए। जीवन सत्कर्मों में रहे, यही चेष्टा होनी चाहिए। किसी का भी दिल दुखाना जिंदगी नहीं है।
रविवार, 3 मई 2015
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