आज जबर्दस्त गर्मी है। आफिस आने का मन नहीं हो रहा था, मगर नौकरी है तो ना के लिए कोई गुंजाइश नहीं। इसलिए दफ्तर में आया हूं। ब्लाग को काला कर रहा हूं। शब्दों के जरिेए। पिछले दो दिनों से गर्मी संग पानी की किल्लत परेशान कर रही है। सप्लाई नहीं आने से हाल बेहाल है। कल रात टैंकर आ गया था, इससे जैसे-तैसे काम चल गया, लेकिन बस चला भर। न ढंग से नहाना हुआ, न अन्य जरूरी कर्म। शहरों में पानी की दिक्कत बड़ी समस्या होती है। यदि किराए का मकान हो तो और ज्यादा। जबलपुर में पिता जी के नाम सरकारी आवास अलाट था। ब्योहारबाग में। पीडब्लयूडी कालोनी के मकान नंबर 595 में ऐसी दिक्कत कम से कम जीवन के 22 वें बसंत तक अपवाद स्वरूप ही देखी थी। वहां से भोपाल गए तब भी ऐसी दिक्कत अपवाद स्वरूप ही रही। वाराणसी, सोनभद्र में भी नहीं थी। पैतृक गांव प्रतापगढ़ में कुंआ था। बाद में हैंडपंप लग गया। वहां गर्मी के दिनों में दिक्कत आती है, मगर ऐसी नहीं। फिलहाल गंगा -यमुना के शहर में भी पानी की किल्लत मेरे लिए अचरज भरी है। कुव्यवस्था का नतीजा है यह। हमारी सरकारें आजादी के इतने सालों बाद भी यदि सभी के लिए पानी-बिजली का इंतजाम नहीं कर सकी हैं तो उन्हें लानत ही दी जा सकती है। इसके अलावा और कुछ नहीं। चंद लोगों के लिए यहां पानी बेकार बहता है और करोड़ों लोगों सुबह -शाम अपने दैनदिनी की जरूरत पूरी करने के लिए भी पानी नहीं पाते। रात में बिस्तर पर लेटा था तो पानी की दुव्यर्वस्था पर खुद को कोस रहा था। एक हिंदुस्तानी के रूप में जन्म लेने के लिए।
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