शनिवार, 23 मई 2015

पांडे...मकान खाली कर दो...कल तक

पांडे... 
कल मकान खाली कर दो ...
रात सोने की तैयारी कर ही रहा था कि यह फरमान सुना दिया नीरज दुबे ने। उनके मकां में हम किराएदार हैं। पिछले चार साल से भी ज्यादा समय से। नीरज के पिता जी शक्तिधर दुबे ने अपने मकान के ऊपरी हिस्से के दो कमरे किराए पर दिए थे। शक्तिधर जी हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं और चिरंजीव नीरज भी। उनके घर में कल कुछ विवाद हुआ था। हो हल्ला मचा था। अक्सर ऐसे ही मचता है। मैं सुनता हूं, लेकिन कान नहीं देता। कल शुक्रवार को भी मैंने कान नहीं दिया। खैर...। रात में ही दो चार शुभचिंतकों को फोन लगाया। मकान ढूंढने की बात कही। अब तक नतीजा सिफर है। हमारे चिरंजीव शुभम सुबह नेट पर सर्च कर रहे थे किराए का मकान। मुझे हंसी आ गई। कहीं नेट से मकान मिलता है भला। यही सोच रहा हूं। दफ्तर में ज्ञानेंद्र से मदद मांगी। बोले, देखता हूं भाई साहब। 
मैंने एक हफ्ते का समय मांगा है, नीरज से। मकान की तलाश के लिए। दिक्कत यह है कि जब अपन को जिस चीज की जरूरत होती है, नहीं मिलती। मिलती है तो पापड़ बेलने पड़ते हैं। इस बार शायद यही होगा। पता नहीं कब वह घड़ी आएगी जब मकान मिलेगा किराए का। अपनी खुद की छत इस जिंदगी में हर पल दूर होती जा रही है। ऐसे में उन लोगों की किस्मत से ईष्या होनी वाजिब ही है जो अपनी छत के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं। 
बिना लागलपेट के कह सकता हूं कि खानाबदोशी जिंदगी में लिख दी गई है। पता नहीं कब तक के लिए। मोदी सरकार कह रही है कि अच्छे दिन आ गए हैं। आ गए होंगे बेशक आप लोगों के लिए लेकिन मेरे जैसों के लिए नहीं। 
एक बार पिता जी गुस्से में थे। श्राप दिया था --दो कौड़ी के हो तुम। हां बाबू जी आपने सही कहा था दो कौड़ी का हूं मैं। नहीं होता तो क्या कल जैसा नीरज ने कहा, वैसा वह कह पाते। उनके पिता जी ने मकान बनवा लिया है। वह कामयाब हैं। मैं नहीं। शुभम और आयुष को लेकर इतना ही ख्वाब है कि मेरा कि यदि वह शहर में रहें तो कम से कम अपनी छत के नीचे। नहीं तो गांव चलें। गांव में एक कमरा मैंने बनवाया है। सोचता हूं वहीं चलकर रहूं। बहुत हो चुकी लुकुटी कमरिया लटकाए हुए जिंदगी। किराए की जिंदगी भी कोई जिंदगी होती है क्या। इलाहाबाद में तो आठ साल की अवधि में ऐसा ही एहसास हुआ है।  

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