नमस्कार। गुजरे सप्ताह में एक बड़ी खुशी मिली मुझे और मेरे परिवार को। यह थी परिवार में बढ़ी भू-संपत्ति। दरअसल अनुज दीपक ने वाराणसी में जमीन लिखा ली। ईश कृपा से अब जल्द ही उन पर लगा किराएदार का तमगा मिट जाएगा। वह अपने आशियाने में रहने लगेंगे। पिता जी की कृपा मानता हूं उन पर। दीपू की अभी उम्र है,साथ श्री और देव छोटे हैं इसलिए वह यथाशीघ्र बैंक लोन इत्यादि चुकता कर देंगे, ऐसा विश्वास है। बड़े भाई के रूप में मुझसे जो बन पड़ेगा, वह मदद तो करूंगा ही। दीपू ने कुछ पैसे मांगे थे, अभी नहीं दे सका हूं। पीएफ से कुछ पैसा निकालकर उन्हें जरूर दूंगा। आखिरकार मेरा अंशदान तो होना ही चाहिए।
खैर इस प्रसंग का दो चार लोगों से जिक्र किया। रिश्तेदारों से। उनके मुंह से यही निकला, तुम तो बुद्धू ही रह गए। मैंने कहा क्यों, जवाब मिला-खुद कब तक किराए पर रहोगे। मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है। इसकी वजह संभवत मेरा प्रारब्ध है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी अपने आशियाने के लिए प्रयास नहीं किया। जबलपुर में जब पिता जी रिटायर होने वाले थे, तब कोशिश की। भोपाल में नवभारत में काम के दौरान जिस मकान में रहते थे, उनके मालिक लखनलाल ने घर लिखा लेने के लिए कहा था। भरोसा दिलाया था कि धीरे धीरे कर पैसे चुका देना, लेकिन पिता जी गांव में आ गए थे। दीपू भी वहीं रहने लगे थे। अम्मा गुजर चुकी थीं, इसलिए घर के आसपास नौकरी करने की ठान चुका था और प्रयास सफल भी रहा। अमर उजाला वाराणसी में नौकरी भी मिल गई। गांव पास हो गया, लेकिन खुद का आशियाना दूर। काशी पत्रकार संघ की तरफ से चुप्पेपुर आवासीय कालोनी के लिए जब ड्रा होने का समय था, सोनभद्र तबादला हो गया। वाराणसी में तब पांच अथवा दस हजार रुपये का जुगाड़ नहीं हो सका कि ड्रा में शामिल हो गया होता। सोनभद्र जाने के बाद कुछ सहयोगियों ने जमीन खरीद लेने की सलाह दी, लेकिन तब गांव में घर बनवाना जरूरी समझा। कच्चा घर था। हमेशा डर बना रहता था हादसे का। गांव में घर बना, दीपू की शादी भी हो गई। समय चक्र बलवान बना रहा। मैं भी सोनभद्र से बलिया, फिर इलाहाबाद और रांची, जबलपुर वाराणसी होते हुए वापस इलाहाबाद आ गया। संस्थान बदला, लेकिन तकदीर नहीं बदली। खानाबदोशी भारी रही। जब भी दीपू और मेरी चर्चा हुई, किराए का घर जरूर रहा इसमें। मैं बाबू जी को कई बार इस बात की उलाहना देने से भी नहीं चूका कि क्यों नहीं उन्होंने जबलपुर में ही जमीन ले ली। रिटायरमेंट के बाद इतने पैसे तो मिले थे कि जबलपुर में ठीक ठाक जमीन ले ली गई होती। यदि वह जमीन होती तो आज शायद दोनों भाईयों के पास खानाबदोशी का ठप्पा नहीं लगा होता। जमाने की निगाह किराएदारों के प्रति हिकारत भरी होती है। मकान मालिक कहते हैं कि मकान बनवाना किसी बड़े यज्ञ से कम नहीं। अब मुझे लगता है कि हां वह सही हैं। महायज्ञ है। यह तभी संभव होता है जब बड़ों की पिता अथवा पितामह की किरपा हो। मुझ पर यह नहीं है। दीपू को मिली है। पितृपक्ष में पितर आए हैं इस बार। दीपू उनको भा गए। उन्हें वह कुछ देकर जा रहे हैं, मुझ पर कब मेहरबान होंगे, मैं नहीं जानता। आखिरी सांस शहर के अपने मकान में लूं, यह ख्वाहिश है, पर क्या यह पूरी होगी...देखिए।
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