नमस्कार।
सप्ताहांत पर फिर हाजिर हूं। इस बार देशकाल पर बात करने का कुछ ज्यादा मन नहीं है। फिर भी थोड़ा सा। रामरहीम सजा पा गए हैं अपने किए की। आज सुबह सुबह मोदी जी ने मंत्रिमंडल का तीसरा विस्तार भी कर लिया है और चीन चले गए हैं ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने। डोकलाम का गतिरोध खत्म हो गया है। भारत ने सेना हटा ली है वहां से और चीन ने सड़क निर्माण का इरादा छोड़ दिया है। पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि संक्षिप्त युद्ध हो सकता है, मेरा आकलन गलत रहा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा था कि युद्ध होता है तब भी शांति के लिए बात ही करनी पडे़गी। भारत ने सधी प्रतिक्रिया दी थी इस मसले पर। लड़ने भिड़ने वाली बात नहीं की। चीन को भी समझ में आ गया कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। कश्मीर में आतंकवादियों पर प्रहार तथा पत्थरबाजी जारी है। अब मुझे लगता है कि यह दौर भी धीमे धीमे खत्म हो जाएगा। अरुण जेटली का एक वाक्य मेरे लिए जीवन की कुंजी बन गया है कि समस्याएं कभी कभी अपना समाधान खुद ढूढ़ लेती है। यही शायद व्यक्तिगत, सार्वजनिक जीवन का फलसफा है।
भारत के पूर्वी हिस्से इन दिनों बाढ़ से बेहाल हैं, यूपी जापानी इंसेफ्लाइटिस से। पश्चिम में बाढ़ के साथ-साथ उत्सव है। इस उत्सव को गणेशोत्सव के नाम से हम जानते हैं। इस बार मैं देख रहा हूं कि इलाहाबाद और उसके आसपास भी गणेशोत्सव की धूम है। मूर्तियां स्थापित कर भक्तजन पूजा कर रहे हैं। मेरी भी ख्वाहिश रहती है कि मैं गणेशोत्सव के दौरान घर में मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन अर्चन करूं। बचपन में जबलपुर में ब्योहारबाग के पीडब्ल्यूडी कालोनी में सार्वजनिक तौर पर होने वाली पूजा में बढ़ चढ़ कर शिरकत करता था, इसलिए भी शायद गणेशोत्सव की अमिट छाप है मुझ पर। शुभम् जब पेट में थे। तब मैंने मन ही मन कामना की थी कि पहली संतान पुत्र के रूप में हो। एक हजार रुपये चंदा दूंगा। शुभम हुए तो वादा निभाया। मनौती पूरी की। कालोनी की मूर्ति विसर्जन के बाद खामोशी पसर जाती थी। इससे पहले 10 दिन तक आरती से लेकर ग्वारीघाट में मां नर्मदा के आंचल में बप्पा के विर्सजन तक धूम रहती थी। इसके बाद करीब दो दिन तो कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर धीरे धीरे जिदंगी रफ्तनी पकड़ती थी। यूपी में जब से हूं तब से ऐसी अनुभूति नहीं हुई। इलाहाबाद में एक बार प्रतिमा स्थापित की। बनारस में भी एक बार। किराए के घर में बंदिशें होती हैं, मनमाफिक पूजा अर्चना नहीं हो पाती, इसलिए इस बार इरादा त्याग दिया। अभी जिस मकान में हूं, वहां मन भी नहीं करता। न मेरा, न श्रृद्धा का। आज दफ्तर में था। सहयोगी आशुतोष तिवारी ने मुंबई के प्रभादेवी में स्थापित सिद्धि विनायक मंदिर से जुड़ा प्रसंग छेड़ दिया। कहा कि सच्चे मन से यहां की गई कोई आराधना निष्फल नहीं जाती। उन्होंने मुंबई में संपत्ति से जुड़े एक विवाद की जानकारी दी। कहा कि बात कोर्ट कचहरी तक जाने वाली थी, लेकिन जैसे ही वह अपने चाचा जी के साथ दर्शन पूजन कर निकले, मामला सेटल हो गया। सिद्धि विनायक की कृपा ही है यह। मुझे इससे नाइत्तेफाकी की कोई वजह नहीं दिखती। मैंने भी मन ही मन अपनी मनौती कर ली है। अब देखना यह है कि सिद्धि विनायक कब इसे पूरी करते हैं और कब मेरा मुंबई में जाकर उनके दर्शन की अभिलाषा पूरी होती है। खैर गजानन की कृपा मेरे परिवार पर रही है। पिता जी आज थोड़ा बहुत भी चल फिर ले रहे हैं तो उनकी ही कृपा है। दीपू को बैंकाक जाने का मौका मिला है। यह भी मेरे लिए खुशी का पल है। घर परिवार पर गणेश जी की कृपा बनी रहे।
संभवतः कल गणेशोत्सव का औपचारिक समापन हो जाएगा। लाल बाग के राजा समेत तमाम स्थानों पर भक्तों पर स्नेहाशीष बिखेरने के बाद बप्पा चले जाएंगे। अगले साल आएंगे, लेकिन जीवन के जरूरी तत्व जल में विसर्जित होने से पहले कितनी खुशियां देकर जाएंगे, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। मैं तो कतई नहीं। बस शब्दों से उनसे मांग ही सकता हूं। मैं भी कुछ मांग रहा हूूं। दर्द फिल्म के इस गीत को गुनगुनाते हुए ...गणपित बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ। बस इसमें इतना और जोड़ दे रहा हूं कि मेरे परिवार, शुभेच्छुओं के लिए खुशियां देता जा.... ।
मुंबई के सिद्धि विनायक।
सप्ताहांत पर फिर हाजिर हूं। इस बार देशकाल पर बात करने का कुछ ज्यादा मन नहीं है। फिर भी थोड़ा सा। रामरहीम सजा पा गए हैं अपने किए की। आज सुबह सुबह मोदी जी ने मंत्रिमंडल का तीसरा विस्तार भी कर लिया है और चीन चले गए हैं ब्रिक्स सम्मेलन में शिरकत करने। डोकलाम का गतिरोध खत्म हो गया है। भारत ने सेना हटा ली है वहां से और चीन ने सड़क निर्माण का इरादा छोड़ दिया है। पिछले सप्ताह मैंने लिखा था कि संक्षिप्त युद्ध हो सकता है, मेरा आकलन गलत रहा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा था कि युद्ध होता है तब भी शांति के लिए बात ही करनी पडे़गी। भारत ने सधी प्रतिक्रिया दी थी इस मसले पर। लड़ने भिड़ने वाली बात नहीं की। चीन को भी समझ में आ गया कि भारत अब 1962 वाला नहीं है। कश्मीर में आतंकवादियों पर प्रहार तथा पत्थरबाजी जारी है। अब मुझे लगता है कि यह दौर भी धीमे धीमे खत्म हो जाएगा। अरुण जेटली का एक वाक्य मेरे लिए जीवन की कुंजी बन गया है कि समस्याएं कभी कभी अपना समाधान खुद ढूढ़ लेती है। यही शायद व्यक्तिगत, सार्वजनिक जीवन का फलसफा है।
भारत के पूर्वी हिस्से इन दिनों बाढ़ से बेहाल हैं, यूपी जापानी इंसेफ्लाइटिस से। पश्चिम में बाढ़ के साथ-साथ उत्सव है। इस उत्सव को गणेशोत्सव के नाम से हम जानते हैं। इस बार मैं देख रहा हूं कि इलाहाबाद और उसके आसपास भी गणेशोत्सव की धूम है। मूर्तियां स्थापित कर भक्तजन पूजा कर रहे हैं। मेरी भी ख्वाहिश रहती है कि मैं गणेशोत्सव के दौरान घर में मूर्ति स्थापित कर विधिवत पूजन अर्चन करूं। बचपन में जबलपुर में ब्योहारबाग के पीडब्ल्यूडी कालोनी में सार्वजनिक तौर पर होने वाली पूजा में बढ़ चढ़ कर शिरकत करता था, इसलिए भी शायद गणेशोत्सव की अमिट छाप है मुझ पर। शुभम् जब पेट में थे। तब मैंने मन ही मन कामना की थी कि पहली संतान पुत्र के रूप में हो। एक हजार रुपये चंदा दूंगा। शुभम हुए तो वादा निभाया। मनौती पूरी की। कालोनी की मूर्ति विसर्जन के बाद खामोशी पसर जाती थी। इससे पहले 10 दिन तक आरती से लेकर ग्वारीघाट में मां नर्मदा के आंचल में बप्पा के विर्सजन तक धूम रहती थी। इसके बाद करीब दो दिन तो कुछ अच्छा ही नहीं लगता था। फिर धीरे धीरे जिदंगी रफ्तनी पकड़ती थी। यूपी में जब से हूं तब से ऐसी अनुभूति नहीं हुई। इलाहाबाद में एक बार प्रतिमा स्थापित की। बनारस में भी एक बार। किराए के घर में बंदिशें होती हैं, मनमाफिक पूजा अर्चना नहीं हो पाती, इसलिए इस बार इरादा त्याग दिया। अभी जिस मकान में हूं, वहां मन भी नहीं करता। न मेरा, न श्रृद्धा का। आज दफ्तर में था। सहयोगी आशुतोष तिवारी ने मुंबई के प्रभादेवी में स्थापित सिद्धि विनायक मंदिर से जुड़ा प्रसंग छेड़ दिया। कहा कि सच्चे मन से यहां की गई कोई आराधना निष्फल नहीं जाती। उन्होंने मुंबई में संपत्ति से जुड़े एक विवाद की जानकारी दी। कहा कि बात कोर्ट कचहरी तक जाने वाली थी, लेकिन जैसे ही वह अपने चाचा जी के साथ दर्शन पूजन कर निकले, मामला सेटल हो गया। सिद्धि विनायक की कृपा ही है यह। मुझे इससे नाइत्तेफाकी की कोई वजह नहीं दिखती। मैंने भी मन ही मन अपनी मनौती कर ली है। अब देखना यह है कि सिद्धि विनायक कब इसे पूरी करते हैं और कब मेरा मुंबई में जाकर उनके दर्शन की अभिलाषा पूरी होती है। खैर गजानन की कृपा मेरे परिवार पर रही है। पिता जी आज थोड़ा बहुत भी चल फिर ले रहे हैं तो उनकी ही कृपा है। दीपू को बैंकाक जाने का मौका मिला है। यह भी मेरे लिए खुशी का पल है। घर परिवार पर गणेश जी की कृपा बनी रहे।
संभवतः कल गणेशोत्सव का औपचारिक समापन हो जाएगा। लाल बाग के राजा समेत तमाम स्थानों पर भक्तों पर स्नेहाशीष बिखेरने के बाद बप्पा चले जाएंगे। अगले साल आएंगे, लेकिन जीवन के जरूरी तत्व जल में विसर्जित होने से पहले कितनी खुशियां देकर जाएंगे, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। मैं तो कतई नहीं। बस शब्दों से उनसे मांग ही सकता हूं। मैं भी कुछ मांग रहा हूूं। दर्द फिल्म के इस गीत को गुनगुनाते हुए ...गणपित बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ। बस इसमें इतना और जोड़ दे रहा हूं कि मेरे परिवार, शुभेच्छुओं के लिए खुशियां देता जा.... ।
मुंबई के सिद्धि विनायक।

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