पिछले हफ्ते चाह कर भी कुछ नहीं लिख सका। जब लिखने बैठा, सहयोगी गोपाल आ गए। मन भटक गया। बावला होता है न यह। अनायास लिखने का मन नहीं होता। सयास लिखा जाए, पर वह हो क्या। यह बड़ा सवाल होता है। खैर, आज सुबह हिंदुस्तान में आजकल कालम के लिए उकेरे गए शशिशेखर जी के शब्द पढ़े। अमर उजाला में सुधीश पचौरी को पढ़ा। शशि जी ने बारिश की याद दिलाई। इसके बहाने अपना बचपना याद किया। वह (शशि जी) जिस पद पर हैं, वहां से अपनी यादों को ताजा कर सकते हैं लाखों लाख पाठकों के सामने। मेरे पास ऐसा कोई मंच नहीं है। मुझे लगा मेरा यही मंच सही। निश्चित तौर पर बारिश मेरे जीवन में भी सुखद एहसास ही कराती रही है आमतौर पर। एकाध प्रसंग जरूर याद हैं जब मैंने इंद्रदेव से यह कामना की कि अब वह बरसना बंद करें। जबलपुर में वर्ष 1994 में हुई मानसूनी बारिश अब भी याद है। उसी साल शुभम हुए थे। घर में एक सुबह पानी ही पानी था। बाबू जी पूजा कर रहे थे, अचानक से नाले का पानी घुस आया, चीजें बहने लगीं। सिलेंडर से लेकर अन्य हल्की वस्तुएं। बाहर सड़क पर भी वही हाल था। मैं देर रात सोया था, सुबह उठ नहीं पाया। उठा तो बिस्तर के नीचे बारिश का पानी ही पानी था। शुभम जिस दिन हुए, उस दिन भी झमाझम बारिश हुई थी। तारीख थी 17 जुलाई। ब्यौहारबाग की उस पीडब्लयूडी कालोनी में जो अब तक मानस पटल से नहीं हटी है। एक बार की बारिश और याद है। गांव में था मैं। बाबा दिवंगत हुए थे उस साल। वर्ष था 1984-85। तेरहवीं होनी थी बाबा की। खूब पानी बरसा। बाबू जी के साथ मैं दिलीपपुर बाजार गया था सामान की खरीदारी करने। आते समय इतना पानी गिरा कि भीग गया। तब घर कच्चा था गांव का। खपरैल हर साल खराब होता था। बाबू जी जीपीएफ से फंड निकालते, छाजन ठीक होता। नए खप्पर मंगवाए जाते। टूटते। बनते। यह सिलसिला 2004-05 तक उस वक्त तक चलता रहा, जब तक कि घर पक्का नहीं हो गया। अब गांव में बारिश में जा ही नहीं पाता। वहां सुविधाएं हैं, लेकिन घर वीरान है। हम दो भाई हैं, दोनों घर से दूर। मैं इलाहाबाद में, छोटा बनारस में। बाबू जी की सेहत साथ नहीं देती। वह भी बनारस में हैं। गांव का घर निश्चित तौर पर हमें कोसता होगा। बारिश के दिनों में। पक्का होने के बाद भी। जब साफ सफाई नहीं हो तो और कहेगा भी क्या?
पक्का घर बनने के बाद बारिश की बूंदों के बीच भजिया पकौड़ी खाने का अपना सुख है। एकाध बार ऐसा आनंद उठाया हूं। छत पर अंडर वियर पहन कर झिड़की के बीच भीगने का भी सुख लिया हूं। लेकिन बात काफी पुरानी हो गई है अब। दो साल पहले ठीक 10 जुलाई को श्रद्धा के साथ गांव गया था। बाबू जी के लिए किशोरी के यहां से समोसे और रसगुल्ले लेकर। उनका जन्मदिन पड़ता है 10 जुलाई को। इसलिए। उस दिन भी बारिश हुई थी। बाबू जी हमें अपने बीच पाकर आल्हादित थे। मैं भी भीगना चाहता था, लेकिन अपनी इच्छा को अंजाम नहीं दे सका। इस बार इलाहाबाद में हूं। किराए के मकान में। यहां यदि एक से दो घंटे पानी बरसता है तो गली से निकलना आसान नहीं होता। नाली ओवर फ्लो हो जाती है। फिर भी चाहता हूं कि खूब पानी बरसे। आखिर इंद्रदेव की इसी कृपा से तो हम सभी का गला तल होता है। शशिशेखर जी को पढ़ा तो मन में कल्पना करने लगा, काश मैं भी किसी ऐसी जगह होता जहां पार्क होता, बालकनी से बारिश को निहारता और प्रफुल्लित होता। बचपन में खूब भीगा हूं। अब भी भीगता। छत पर चढ़कर। भले ही डाट फटकार पड़ती रही। यदि दैव कृपा से शहर में घर बनाने का मौका मिला तो जरूर भीगूंगा।
जुलाई के महीेने में परिवार में तीन लोगों के जन्मदिन पड़ते हैं। सबसे पहले 10 तारीख को बाबू जी। फिर 17 को शुभम और 30 जुलाई को देव का। ईश्वर की कृपा ही है। जुलाई मेरे परिवार के लिए खास है। सभी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देकर अपनी बात खत्म करूंगा।
पक्का घर बनने के बाद बारिश की बूंदों के बीच भजिया पकौड़ी खाने का अपना सुख है। एकाध बार ऐसा आनंद उठाया हूं। छत पर अंडर वियर पहन कर झिड़की के बीच भीगने का भी सुख लिया हूं। लेकिन बात काफी पुरानी हो गई है अब। दो साल पहले ठीक 10 जुलाई को श्रद्धा के साथ गांव गया था। बाबू जी के लिए किशोरी के यहां से समोसे और रसगुल्ले लेकर। उनका जन्मदिन पड़ता है 10 जुलाई को। इसलिए। उस दिन भी बारिश हुई थी। बाबू जी हमें अपने बीच पाकर आल्हादित थे। मैं भी भीगना चाहता था, लेकिन अपनी इच्छा को अंजाम नहीं दे सका। इस बार इलाहाबाद में हूं। किराए के मकान में। यहां यदि एक से दो घंटे पानी बरसता है तो गली से निकलना आसान नहीं होता। नाली ओवर फ्लो हो जाती है। फिर भी चाहता हूं कि खूब पानी बरसे। आखिर इंद्रदेव की इसी कृपा से तो हम सभी का गला तल होता है। शशिशेखर जी को पढ़ा तो मन में कल्पना करने लगा, काश मैं भी किसी ऐसी जगह होता जहां पार्क होता, बालकनी से बारिश को निहारता और प्रफुल्लित होता। बचपन में खूब भीगा हूं। अब भी भीगता। छत पर चढ़कर। भले ही डाट फटकार पड़ती रही। यदि दैव कृपा से शहर में घर बनाने का मौका मिला तो जरूर भीगूंगा।
जुलाई के महीेने में परिवार में तीन लोगों के जन्मदिन पड़ते हैं। सबसे पहले 10 तारीख को बाबू जी। फिर 17 को शुभम और 30 जुलाई को देव का। ईश्वर की कृपा ही है। जुलाई मेरे परिवार के लिए खास है। सभी को जन्मदिन की शुभकामनाएं देकर अपनी बात खत्म करूंगा।
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